डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से अमेरिका को “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” का नारा देते आए हैं। उनका सबसे बड़ा सपना है अमेरिका में विनिर्माण रोजगार बढ़ाना। वे कहते हैं कि चीन, मैक्सिको और अन्य देशों से सस्ते आयात के कारण अमेरिकी कारखाने बंद हो रहे हैं। इसलिए वे भारी टैरिफ लगाकर विदेशी माल महंगा कर देंगे, ताकि अमेरिकी फैक्टरियां फिर से फलें-फूलें और लाखों नौकरियां वापस आएं। लेकिन अर्थशास्त्र की दुनिया में एक पुरानी कहावत है – “सब कुछ जो चमकता है, सोना नहीं होता।” ट्रंप को शायद यह नहीं पता कि ट्रेड वॉर कोई साधारण युद्ध नहीं, बल्कि एक ऐसा जाल है जो पूरी दुनिया को घेर लेता है। यह अनिश्चितता पैदा करता है, डॉलर को मजबूत बनाता है, अमेरिकी माल की मांग घटाता है और अंत में अमेरिका समेत पूरी दुनिया में रोजगार कम कर देता है। पेसिमिज्म फैलता है, निवेश रुक जाता है और एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। यह कहानी उसी दुष्चक्र की है – ऐतिहासिक उदाहरणों और एक काल्पनिक लेकिन यथार्थवादी आर्थिक कथा के साथ I
कल्पना कीजिए, वर्ष २०२६ का वाशिंगटन। व्हाइट हाउस के
रोज गार्डन में खड़े होकर राष्ट्रपति ट्रंप जोरदार आवाज में घोषणा करते हैं,
“हम
अमेरिकी स्टील, ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक्स को बचाएंगे। चीन पर ६० प्रतिशत टैरिफ, यूरोप
पर २० प्रतिशत! अमेरिका पहले!” भीड़ तालियां बजाती है। डेट्रॉइट के एक पुराने
कारखाने में काम करने वाला जॉन मिलर खुश है। वह अपने साथियों से कहता है, “अब
हमारी नौकरियां सुरक्षित हैं। विदेशी कारें महंगी हो जाएंगी, लोग
हमारी खरीदेंगे।”
लेकिन कुछ महीनों बाद ही हकीकत सामने आती है। टैरिफ के कारण चीन से
आने वाले पार्ट्स, स्टील और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स ३०-४० प्रतिशत महंगे हो जाते हैं।
अमेरिकी कार कंपनियां जैसे फोर्ड और जनरल मोटर्स को लागत बढ़ जाती है। वे कीमतें
बढ़ा देते हैं। आम अमेरिकी उपभोक्ता को हर नई कार पर २-३ हजार डॉलर ज्यादा देने
पड़ते हैं। किराने की दुकान पर भी चीनी सामान (जो अब टैरिफेड है) महंगा हो जाता
है। मुद्रास्फीति (inflation) ५-६ प्रतिशत तक पहुंच जाती है। जॉन की
पत्नी मारिया किराने का बिल देखकर चीख पड़ती है, “अब तो रोटी-दाल
भी महंगी हो गई! ट्रंप ने नौकरी बचाई या हमारी जेब काटी?”
दुनिया भर के देश चुप नहीं बैठते। चीन तुरंत जवाब देता है – अमेरिकी
सोयाबीन, बोइंग एयरक्राफ्ट और हार्लेड डेविडसन मोटरसाइकिल्स पर भारी टैरिफ। यूरोपीय
संघ ऑटो और व्हिस्की पर, भारत फार्मा और टेक्सटाइल पर। यह ट्रेड
वॉर है। २०१८-१९ में ट्रंप की पहली टर्म में चीन के साथ जो हुआ था, वही
दोहरा रहा है। तब अमेरिकी टैरिफ ने ४६ बिलियन डॉलर का बोझ अमेरिकी कंपनियों पर
डाला था। मूडीज एनालिटिक्स के अनुसार ३ लाख नौकरियां चली गई थीं। विनिर्माण रोजगार
न बढ़ा, बल्कि घटा। किसान दिवालिया हो गए। अब २०२६ में फिर वही चक्र।
लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है – अनिश्चितता का। कारखाने के मालिक निवेश करने से डरते हैं। “अगले साल क्या होगा?
नया
टैरिफ आएगा या नहीं?” वे नई मशीनें नहीं लगाते, न नए प्लांट बनाते। बैंक लोन नहीं
देते। स्टॉक मार्केट में उतार-चढ़ाव बढ़ जाता है। वैश्विक अनिश्चितता के इस माहौल
में निवेशक सुरक्षित ठिकाना ढूंढते हैं – अमेरिकी डॉलर! क्योंकि डॉलर दुनिया का
सबसे सुरक्षित मुद्रा है। ट्रेजरी बिल्स में पैसा बहता है। डॉलर इंडेक्स १०-१५
प्रतिशत मजबूत हो जाता है।
अब समस्या गहरी हो जाती है। मजबूत डॉलर का मतलब – अमेरिकी माल विदेश
में और महंगा! जर्मनी में एक अमेरिकी ट्रैक्टर पहले ५० हजार यूरो का था, अब
५८ हजार। जापान में बोइंग विमान महंगा। भारत में एप्पल आईफोन महंगा। मांग घटती है।
अमेरिकी निर्यात गिरता है। जॉन के कारखाने में ऑर्डर कम हो जाते हैं। ओवरटाइम बंद।
कुछ वर्कर्स को लेआउफ। जॉन हैरान, “हमारी नौकरियां बचानी थीं, लेकिन
अब तो हमारी ही कंपनी संकट में!
”दुनिया भर में यही हाल। चीन के शंघाई के कारखाने में लिंग वर्कर
वांग कहता है, “अमेरिका का बाजार बंद, हमारी निर्यात गिर गई। मालिक ने २०
प्रतिशत वर्कर्स निकाल दिए।” जर्मनी के म्यूनिख में ऑटो इंजीनियर हंस बेरोजगार हो
जाता है। भारत के गुजरात के टेक्सटाइल मिल में मजदूरों की पारी घट जाती है।
क्योंकि अमेरिका, चीन, यूरोप सबकी मांग कम। वैश्विक व्यापार सिकुड़ता है।
यह सब आत्म-स्पष्ट हो जाता है
क्योंकि पेसिमिज्म फैलता है। लोग सोचते हैं – “भविष्य अंधकारमय है।” उपभोक्ता खर्च
कम करते हैं। कंपनियां निवेश रोकती हैं। बैंकों में क्रेडिट क्रंच। नई फैक्टरियां,
नई
टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स – सब रुक जाते हैं। रोजगार सृजन ठप। १९३० का
स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट याद आता है। तब अमेरिका ने आयात पर औसत २० प्रतिशत टैरिफ
बढ़ाया। २५ से ज्यादा देशों ने बदला लिया। विश्व व्यापार ६६ प्रतिशत गिर गया
(१९२९-१९३४)। ग्रेट डिप्रेशन और गहरा हुआ। अमेरिका में बेरोजगारी २५ प्रतिशत पहुंच
गई। यूरोप, एशिया में भी लाखों नौकरियां चली गईं। निवेशकों का विश्वास टूटा,
बैंक
फेल हुए। आज २०१८ का ट्रेड वॉर भी वही सबक सिखाता है – टैरिफ ने अमेरिकी
उपभोक्ताओं पर बोझ डाला, निर्यातकों को नुकसान पहुंचाया और
वैश्विक अनिश्चितता बढ़ाई। फेडरल रिजर्व और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अध्ययनों में
साफ है कि कंपनियों के स्टॉक १.७ ट्रिलियन डॉलर गिरे।कहानी में अब जॉन मिलर अपने
बेटे से कहता है, “बेटा, ट्रंप साहब ने सोचा था कि दीवार खड़ी करके हम सुरक्षित हो जाएंगे।
लेकिन दीवार ने हवा भी रोक दी। हमारी फैक्टरी में ऑर्डर कम, मुद्रास्फीति ने
बचत खा ली। चीन में हमारे दोस्तों की नौकरियां गईं, उनकी मांग कम
हुई तो हमारा भी नुकसान।” वांग शंघाई से फोन पर कहता है, “यह युद्ध किसी
का नहीं जीता।”
अनिश्चितता ने डॉलर को तो मजबूत किया, लेकिन अमेरिकी
उत्पादों की मांग दुनिया भर में घटा दी। अन्य देशों की मुद्राएं कमजोर हुईं,
लेकिन
उनका निर्यात भी प्रभावित हुआ। वैश्विक रोजगार घटी। पेसिमिज्म ने निवेश को मार
दिया। एक-एक करके कारखाने बंद, स्कूलों में शिक्षा बजट कट, स्वास्थ्य
सेवाएं प्रभावित। यह दुष्चक्र था – ट्रंप का विनिर्माण सपना विश्व की बेरोजगारी
में बदल गया।
इस आर्थिक कहानी से एक बड़ा सबक निकलता है। ट्रेड वॉर कोई समाधान नहीं, बल्कि समस्या का रूप है। ट्रंप साहब का इरादा नेक हो सकता है – अमेरिकी मजदूरों को नौकरियां देना। लेकिन अर्थशास्त्र नीयत नहीं, परिणाम देखता है। इतिहास गवाह है: स्मूट-हॉली ने १९३० में दुनिया को गर्त में धकेला, २०१८ के ट्रेड वॉर ने अमेरिका को सैकड़ों हजार नौकरियां गंवाईं। आज अगर फिर वही गलती हुई तो अनिश्चितता डॉलर को सुरक्षित ठिकाना बनाएगी, लेकिन अमेरिकी निर्यात को मार देगी। विश्व रोजगार घटेगा, निवेश रुकेगा, पेसिमिज्म फैलेगा।सच्चा रास्ता सहयोग का है – निष्पक्ष व्यापार समझौते, नवाचार, स्किल डेवलपमेंट, शिक्षा और टेक्नोलॉजी में निवेश। अमेरिका अगर अपनी ताकत – रिसर्च, उद्यमिता – पर भरोसा करे तो विनिर्माण रोजगार बढ़ सकते हैं बिना दुनिया को नुकसान पहुंचाए। ट्रेड वॉर युद्ध है, लेकिन शांति से ही समृद्धि आती है। इतिहास दोहराना नहीं चाहिए। अमेरिका पहले, लेकिन दुनिया के साथ – यही असली महानता है।यह कहानी केवल कल्पना नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र के सिद्धांतों और सच्चे ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। आशा है कि नेता इसे पढ़कर सोचें – दीवारें नहीं, पुल बनाएं।
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