Friday, March 6, 2026

भारत में तेल और गैस पर उच्च करों का बोझ: अवशोषण क्षमता, आर्थिक प्रभाव और भविष्य के निहितार्थ.....

परिचय

भारत की अर्थव्यवस्था आयातित तेल और गैस पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसमें 85% से अधिक कच्चा तेल विदेश से प्राप्त होता है। यह निर्भरता देश को वैश्विक मूल्य अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाती है, लेकिन सरकार का कर ढांचा इन प्रभावों को कम करने या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पेट्रोलियम उत्पादों पर कर, जिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क और राज्य मूल्य वर्धित कर (VAT) शामिल हैं, खुदरा मूल्यों का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं—अक्सर पेट्रोल और डीजल के लिए 50% से अधिक। ये उच्च कर राजकोष के लिए पर्याप्त राजस्व उत्पन्न करते हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि के खिलाफ एक बफर भी प्रदान करते हैं। यह चर्चा इन करों की मात्रा, मूल्य वृद्धि को अवशोषित करने की क्षमता का अनुमान, कर समायोजन से राजकोष को होने वाले नुकसान, मूल्य लोच के आधार पर मांग प्रतिक्रिया का मूल्यांकन, और मुद्रास्फीति तथा आर्थिक विकास पर प्रभावों की जांच करती है। ऐतिहासिक उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि ऐसी गतिशीलता भारत के राजकोषीय और आर्थिक परिदृश्य को कैसे आकार देती है, तथा ऊर्जा क्षेत्र के संक्रमण में संतुलित नीतियों की आवश्यकता पर जोर देती है।

तेल और गैस पर सरकारी करों की मात्रा

भारत में तेल और गैस पर कर बहुआयामी हैं, जिसमें केंद्रीय और राज्य दोनों स्तरों के शुल्क शामिल हैं जो खुदरा मूल्यों को काफी बढ़ा देते हैं। पेट्रोल के लिए केंद्रीय उत्पाद शुल्क लगभग ₹13 प्रति लीटर है, जबकि राज्य VAT बहुत भिन्न होता है—अंडमान एवं निकोबार में 1% से लेकर आंध्र प्रदेश में 31% से अधिक तक, औसतन लगभग 25%। डीजल पर भी समान व्यवस्था है, उत्पाद शुल्क ₹10 प्रति लीटर और VAT औसतन 20-22%। प्राकृतिक गैस पर कर हल्का है, अक्सर ब्लेंडेड रूपों जैसे संपीडित बायोगैस (CBG) के लिए GST छूट के साथ, लेकिन कच्चे तेल के आयात पर मूल्य वृद्धि के समय विंडफॉल टैक्स लगता है। कुल मिलाकर, कर पेट्रोल के खुदरा मूल्य का 55% और डीजल का 50% हिस्सा बनाते हैं, जिससे ईंधन उच्च कर वाले वस्तुओं में से एक है।  यह संरचना विकसित हुई है, पेट्रोलियम उत्पाद GST व्यवस्था से बाहर बने हुए हैं, हालांकि 28% दर पर शामिल करने की बहस जारी है। 2026 के केंद्रीय बजट में, अनब्लेंडेड डीजल पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को 2028 तक स्थगित करने और छोटी कारों पर GST को 18% तक कम करने जैसे उपाय स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए हैं, लेकिन मूल कर उच्च बने हुए हैं। सरकार की रणनीति इन शुल्कों का उपयोग घरेलू मूल्यों को स्थिर करने के लिए करती है: जब वैश्विक कच्चा तेल गिरता है, तो उत्पाद शुल्क बढ़ाकर लाभ प्राप्त किया जाता है, जैसा कि 2014 से 2022 के बीच कई बार हुआ, जिससे उत्पाद शुल्क राजस्व ₹1.7 लाख करोड़ से बढ़कर ₹3.3 लाख करोड़ से अधिक हो गया।

मूल्य वृद्धि अवशोषण और राजकोष को नुकसान का अनुमान

उच्च कर घटक के कारण, भारत की व्यवस्था महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि को बिना खुदरा मूल्य बढ़ाए अवशोषित कर सकती है। उदाहरण के लिए, वैश्विक कच्चे तेल में 10% वृद्धि ($80 से $88 प्रति बैरल) को उत्पाद शुल्क में ₹2-3 प्रति लीटर की कमी से ऑफसेट किया जा सकता है, पंप मूल्यों को स्थिर रखते हुए। ऐतिहासिक डेटा से पता चलता है कि कर बफर 20-30% वैश्विक वृद्धि को अवशोषित कर सकता है, क्योंकि कर प्रभावी मूल्य में $20-30 प्रति बैरल के बराबर कुशन प्रदान करते हैं।  हालांकि, यह अवशोषण राजकोष के लिए लागत पर आता है। जब उपभोक्ताओं की रक्षा के लिए कर कटौती की जाती है, तो राजस्व हानि बढ़ती है। उदाहरणों में 2021 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पेट्रोल पर ₹13 और डीजल पर ₹16 की उत्पाद शुल्क कटौती शामिल है, जिससे सरकार को सालाना ₹1 लाख करोड़ का नुकसान हुआ—लगभग GDP का 0.45%। इसी तरह, 2025 में ₹2 प्रति लीटर उत्पाद शुल्क वृद्धि को तेल कंपनियों ने खाना पकाने की गैस सब्सिडी पर पिछले नुकसान को ऑफसेट करने के लिए अवशोषित किया, लेकिन लंबे समय तक अवशोषण संचयी घाटे का कारण बनता है। यदि 2026-27 में तेल मूल्य औसतन $90-100 प्रति बैरल रहें, तो वृद्धि अवशोषित करने से ₹50,000-80,000 करोड़ का नुकसान हो सकता है, जो राजकोषीय घाटे को बढ़ाता है और LPG तथा केरोसिन सब्सिडी से पहले से बोझिल बजट पर दबाव डालता है।  उच्च कर, हालांकि राजस्व उत्पन्न करने वाले (GDP का 2% योगदान), मांग को दबाने या चोरी को प्रोत्साहित करके विडंबनापूर्ण रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। अत्यधिक कराधान ने ऐतिहासिक रूप से राज्यों के हिस्से को कम किया है, क्योंकि केंद्रीय सेस (राज्यों के साथ साझा नहीं) तेल राजस्व के 52% से बढ़कर 60% हो गए, जिससे 2015 से राज्यों को ₹2-3 लाख करोड़ का नुकसान हुआ।

मांग पर प्रभाव और मूल्य लोच को ध्यान में रखते हुए भविष्य के कर

तेल और गैस की मांग की मूल्य लोच भारत में काफी अनलोचिक है, जो मूल्य वृद्धि से उपभोग और भविष्य की कर रणनीतियों को प्रभावित करती है। कच्चे तेल आयात की लंबी अवधि की मूल्य लोच -0.3 से -0.45 के आसपास है, अर्थात 10% मूल्य वृद्धि से मांग केवल 3-4.5% कम होती है। अल्पकालिक लोच और भी कम -0.2 है, जो सार्वजनिक परिवहन या नवीकरणीय ऊर्जा जैसे विकल्पों की सीमितता को दर्शाती है। आय लोच उच्च 1.2-2.7 है, जो शहरीकरण और औद्योगीकरण से प्रेरित हर 10% GDP वृद्धि पर मांग 12-27% बढ़ने का संकेत देती है।  यह अनलोचिकता का मतलब है कि वृद्धि से मांग पर प्रभाव सीमित होता है: 20% मूल्य वृद्धि से लंबे समय में उपभोग 4-6% कम हो सकता है, लेकिन 7% GDP विस्तार के साथ कुल मांग सालाना 5-6% बढ़ती है। प्राकृतिक गैस के लिए लोच भिन्न है—पेट्रोकेमिकल्स में उच्च (-1.2 लंबी अवधि), जबकि LPG जैसे आवश्यक में लगभग अनलोचिक (0.35)। भविष्य के कर लोच सीमाओं के उल्लंघन पर नीचे समायोजित हो सकते हैं, क्योंकि निरंतर वृद्धि मांग दमन का जोखिम उठाती है। यदि मूल्य $100 प्रति बैरल से अधिक हो, तो मांग 5-10% गिर सकती है, कर आधार को कमजोर कर कटौती की आवश्यकता पैदा कर सकती है। 2013-14 में डीजल डीरेगुलेशन के क्रमिक चरण जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि सरकारें राजस्व और मांग स्थिरता के बीच संतुलन बनाती हैं।

मुद्रास्फीति और विकास पर प्रभाव, उदाहरणों और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ

तेल मूल्य वृद्धि परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ाकर मुद्रास्फीति में स्थानांतरित होती है। 10% वृद्धि से थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में 0.7-1% और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में 0.35-0.4% की वृद्धि होती है, अप्रत्यक्ष प्रभावों से 1-1.5% तक बढ़ सकती है। यह लागत-पुश मुद्रास्फीति को बढ़ावा देती है, खासकर कृषि के लिए डीजल पर निर्भर निम्न-आय वाले परिवारों की क्रय शक्ति को कम करती है।  विकास पर, 10% वृद्धि से GDP में 0.15-0.3% की कटौती होती है, चालू खाता घाटा GDP के 0.5% ($18 बिलियन सालाना) बढ़ाता है। प्रभाव असममित हैं: वृद्धि से अधिक नुकसान होता है जितना गिरावट से लाभ, जैसा कि 2026 में पश्चिम एशिया तनाव से ब्रेंट $90+ पर पहुंचने, रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने और FY27 विकास को 7% से 6.5% तक कम करने में देखा गया।  ऐतिहासिक उदाहरण इन प्रभावों को रेखांकित करते हैं। 2008 का तेल झटका ($140 से अधिक मूल्य) ने 8-9% मुद्रास्फीति उत्पन्न की और विकास को 3.1% तक धीमा किया, सब्सिडी वृद्धि से राजकोषीय घाटा 6% तक पहुंचा। इसके विपरीत, 2014-16 की गिरावट ने कर वृद्धि की अनुमति दी, राजस्व बढ़ाया और विकास 8% तक पहुंचा, लेकिन अत्यधिक निर्भरता ने 2020-21 में महामारी मांग गिरावट से नुकसान पहुंचाया। 2022 में निर्यात पर विंडफॉल टैक्स ने उत्पाद शुल्क कटौती से ₹1 लाख करोड़ वसूला, अनुकूली राजकोषीय उपकरणों का उदाहरण दिया। ये संदर्भ दिखाते हैं कि उच्च कर अल्पकालिक बफर प्रदान करते हैं, लेकिन लंबी वृद्धि स्टैगफ्लेशन का जोखिम उठाती है—उच्च मुद्रास्फीति के साथ स्थिर विकास—जैसा कि 1970 के दशक के वैश्विक तेल संकटों में हुआ, जहां भारत में 20% मुद्रास्फीति और 5% से कम विकास देखा गया।

निष्कर्ष

भारत में तेल और गैस पर उच्च कर, खुदरा मूल्यों का आधे से अधिक हिस्सा बनाते हुए, वैश्विक वृद्धि को अवशोषित करने का मजबूत तंत्र प्रदान करते हैं, संभावित रूप से 20-30% वृद्धि को बिना खुदरा उछाल के कुशन कर सकते हैं। फिर भी, यह अस्थिरता के दौरान राजकोष को सालाना ₹50,000-1 लाख करोड़ का नुकसान पहुंचाता है, अनलोचिक मांग से उपभोग बनाए रखता है लेकिन समायोजन सीमित करता है। लोच गतिशीलता सुझाती है कि भविष्य में करों को मांग क्षरण रोकने के लिए तर्कसंगत बनाना पड़ सकता है, जबकि मुद्रास्फीति (0.35-1% तक) और विकास मंदी (10% वृद्धि पर 0.15-0.3%) निरंतर जोखिम हैं, जैसा कि 2008 और हाल के भू-राजनीतिक उछालों से प्रमाणित है। कर समायोजन और सब्सिडी के ऐतिहासिक उदाहरण अनुकूली नीति निर्माण दिखाते हैं, लेकिन लंबी अवधि के समाधान ऊर्जा विविधीकरण में हैं—2030 तक नवीकरणीय को 50% तक बढ़ाना—और एकरूपता के लिए GST शामिल करना। राजस्व, वहनीयता और स्थिरता के बीच संतुलन भारत के विकास पथ के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि तेल कर प्रगति को बढ़ावा दें न कि बाधा।

No comments:

Post a Comment

रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा: भारतीय भंडारों को मजबूत करने के लिए अमेरिकी छूट का लाभ उठाकर रूसी तेल और गैस आयात बढ़ाना.....

भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के न...