औपचारिक, रोजगार-आधारित आर्थिक प्रतिरूप और कल्याण-समर्थित अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के बीच की बहस विकास अर्थशास्त्र के केंद्र में स्थित है। प्रत्येक राष्ट्र के सामने अपने नागरिकों को आजीविका प्रदान करने की चुनौती होती है, किंतु रोजगार सृजन की पद्धति दीर्घकालिक समृद्धि को गहराई से प्रभावित करती है। औद्योगीकरण, विनिर्माण विस्तार, प्रौद्योगिकीय उन्नयन तथा उद्यमों के विस्तार पर आधारित एक औपचारिक आर्थिक प्रतिरूप स्थिर रोजगार, उच्च उत्पादकता, बढ़ती आय तथा टिकाऊ संपत्ति संचय का निर्माण करता है। इसके विपरीत, अनौपचारिक स्व-रोजगार से प्रभुत्व वाली अर्थव्यवस्था प्रायः अत्यधिक निर्धनता को रोकने में सफल रहती है, किंतु व्यापक समृद्धि उत्पन्न करने में संघर्ष करती है।
भारत इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।
विश्व की सर्वाधिक तीव्र गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के
बावजूद, इसकी कार्यशील जनसंख्या का बड़ा भाग अब भी अनौपचारिक गतिविधियों,
लघु
उद्यमों तथा निम्न-उत्पादकता वाले स्व-रोजगार में संलग्न है। कल्याणकारी
कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने निस्संदेह असुरक्षा को कम किया है तथा
व्यापक निर्धनता को रोकने में सहायता की है। किंतु उन्होंने रोजगार की संरचना में
मूलभूत परिवर्तन नहीं किया है। परिणामस्वरूप, आर्थिक रूप से
सक्रिय होने के बावजूद करोड़ों लोग श्रमशील निर्धनों के रूप में जीवन व्यतीत कर
रहे हैं।
यह प्रतिपादन कि दीर्घकाल में एक औपचारिक और रोजगार-समृद्ध प्रतिरूप
कहीं अधिक श्रेष्ठ है, आर्थिक सिद्धांत, ऐतिहासिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय
उदाहरणों से व्यापक समर्थन प्राप्त करता है।
### सैद्धांतिक आधार
आर्थिक विकास मूलतः श्रम को निम्न-उत्पादकता वाली गतिविधियों से
उच्च-उत्पादकता वाली गतिविधियों की ओर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया है। पारंपरिक
कृषि, फुटकर व्यापार तथा निर्वाह-आधारित स्व-रोजगार सामान्यतः प्रति श्रमिक
सीमित आर्थिक मूल्य उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत, विनिर्माण,
आधुनिक
सेवाएँ तथा बड़े पैमाने के उद्यम प्रति श्रमिक कहीं अधिक उत्पादन सृजित करते हैं।
जब उद्यम आकार में बढ़ते हैं, तब उन्हें
विशेषज्ञता, प्रौद्योगिकी के उपयोग, प्रबंधकीय दक्षता तथा पैमाने की
अर्थव्यवस्थाओं का लाभ प्राप्त होता है। ये कारक उत्पादकता बढ़ाते हैं, जिससे
मजदूरी और लाभ दोनों में वृद्धि होती है। उच्च मजदूरी घरेलू उपभोग को बढ़ाती है,
जबकि
अधिक लाभ निवेश को प्रोत्साहित करता है। इस प्रकार विकास का एक सद्गुणी चक्र
निर्मित होता है।
औपचारिक रोजगार आयकर, निगम कर तथा अप्रत्यक्ष करों के माध्यम
से राजस्व भी उत्पन्न करता है। इससे सरकारें अत्यधिक ऋण पर निर्भर हुए बिना
आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक सुविधाओं का वित्तपोषण कर सकती हैं। इस
प्रकार औपचारिकीकरण निजी समृद्धि और सार्वजनिक क्षमता दोनों को सुदृढ़ बनाता है।
अनौपचारिक अर्थव्यवस्था भिन्न प्रकार से कार्य करती है। लघु उद्यम
प्रायः सीमित पूंजी, ऋण तक कम पहुँच, निम्न प्रौद्योगिकीय क्षमता तथा कमजोर
उत्पादकता वृद्धि से ग्रस्त होते हैं। श्रमिक कार्यरत तो रहते हैं, किंतु
उनकी आय अक्सर स्थिर बनी रहती है क्योंकि उनके द्वारा सृजित आर्थिक मूल्य सीमित
होता है। रोजगार तो होता है, परंतु समृद्धि दुर्लभ बनी रहती है।
### भारतीय अनुभव का विश्लेषण
भारत की आर्थिक संरचना अनौपचारिक विकास प्रतिरूप की शक्तियों और
सीमाओं दोनों को प्रतिबिंबित करती है। सकारात्मक पक्ष यह है कि व्यापक स्व-रोजगार
ने सामाजिक आघात-शोषक की भूमिका निभाई है। जो व्यक्ति औपचारिक रोजगार प्राप्त नहीं
कर पाते, वे सड़क विक्रय, लघु खुदरा व्यापार, परिवहन
सेवाओं, घरेलू उत्पादन तथा असंख्य सूक्ष्म उद्यमों के माध्यम से स्वयं
आजीविका का निर्माण कर लेते हैं।
यह लचीलापन बड़े पैमाने पर खुली बेरोजगारी को रोकता है। उन देशों के
विपरीत जहाँ बेरोजगारी के कारण गंभीर सामाजिक अशांति उत्पन्न होती है, भारत
ने अक्सर अतिरिक्त श्रमशक्ति को अनौपचारिक गतिविधियों के माध्यम से समाहित कर लिया
है।
किंतु इस सफलता के साथ महत्वपूर्ण सीमाएँ भी जुड़ी हुई हैं।
अनेक स्व-रोजगार व्यक्ति ऐसी आय अर्जित करते हैं जो केवल निर्वाह
स्तर से थोड़ी अधिक होती है। उनके उद्यमों को आधुनिक प्रौद्योगिकी, औपचारिक
वित्त, कुशल श्रम तथा बड़े बाजारों तक पर्याप्त पहुँच नहीं मिलती। उत्पादकता
निम्न बनी रहती है, जिससे आय वृद्धि भी सीमित रहती है।
एक सड़क विक्रेता प्रतिदिन बारह घंटे कार्य कर सकता है, किंतु
उसकी आय उस आर्थिक मूल्य का केवल एक छोटा भाग हो सकती है जो एक आधुनिक विनिर्माण
संयंत्र में कार्यरत श्रमिक उत्पन्न करता है। दोनों कार्यरत हैं, परंतु
उनके द्वारा सृजित आर्थिक मूल्य में भारी अंतर है। परिणामस्वरूप, अनौपचारिक
क्षेत्र रोजगार तो उत्पन्न करता है, किंतु पर्याप्त संपत्ति सृजन नहीं कर
पाता।
इसके अतिरिक्त, अनौपचारिक व्यवसाय अक्सर पीढ़ियों तक
छोटे ही बने रहते हैं। वे शायद ही कभी ऐसे राष्ट्रीय स्तर के प्रतिस्पर्धी उद्यमों
में परिवर्तित होते हैं जो नवाचार, निर्यात और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन
को गति दे सकें। फलतः अर्थव्यवस्था में वृद्धि तो होती है, किंतु उसके
अनुरूप गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं बढ़ते।
### ऐतिहासिक उदाहरण
इतिहास स्पष्ट रूप से औद्योगीकरण-आधारित औपचारिक मार्ग के पक्ष में
खड़ा दिखाई देता है।
औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन का परिवर्तन इस बात का प्रमाण है
कि विनिर्माण विस्तार किस प्रकार उत्पादकता और जीवन स्तर को ऊँचा उठा सकता है।
श्रमिक निम्न-उत्पादकता वाली कृषि से कारखानों की ओर गए, जिसके
परिणामस्वरूप अभूतपूर्व आर्थिक विकास हुआ।
इसी प्रकार, युद्धोत्तर जर्मनी ने औद्योगिक विस्तार,
निर्यात
प्रतिस्पर्धा और सुदृढ़ औपचारिक रोजगार संस्थाओं के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था
का पुनर्निर्माण किया। बढ़ती उत्पादकता ने बढ़ती मजदूरी और व्यापक मध्यम वर्गीय
समृद्धि को जन्म दिया।
पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्थाएँ और भी सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती
हैं। दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों ने विनिर्माण, निर्यात,
प्रौद्योगिकीय
उन्नयन तथा बड़े पैमाने के उद्यमों को प्रोत्साहित करके अपेक्षाकृत निर्धन समाजों
से विकसित अर्थव्यवस्थाओं का रूप धारण किया।
विशेष रूप से चीन ने करोड़ों लोगों को निर्धनता से बाहर निकाला,
वह
भी स्थायी कल्याणकारी निर्भरता के माध्यम से नहीं, बल्कि
औद्योगीकरण, नगरीकरण और कारखानों तथा आधुनिक उद्यमों में व्यापक रोजगार सृजन के
द्वारा। श्रमिक निम्न-उत्पादकता वाली ग्रामीण गतिविधियों से उच्च-उत्पादकता वाले
क्षेत्रों में स्थानांतरित हुए, जिससे आय में तीव्र वृद्धि हुई।
इन सभी उदाहरणों में औपचारिक रोजगार विस्तार विकास का प्रमुख प्रेरक
बना।
### समकालीन उदाहरण
दो काल्पनिक श्रमिकों पर विचार कीजिए।
पहला एक छोटी सड़क किनारे की दुकान संचालित करता है। वह तकनीकी रूप
से स्व-रोजगार में है और इसलिए बेरोजगार नहीं माना जाता। किंतु उसकी दैनिक आय
अत्यधिक परिवर्तनशील है। उसे ऋण तक सीमित पहुँच प्राप्त है, कोई औपचारिक
सेवानिवृत्ति लाभ उपलब्ध नहीं है और उत्पादकता बढ़ाने के अवसर भी कम हैं।
दूसरा एक बड़े विनिर्माण प्रतिष्ठान में कार्य करता है जो घरेलू तथा
निर्यात बाजारों के लिए विद्युत उपकरणों का उत्पादन करता है। यह प्रतिष्ठान मशीनों,
श्रमिक
प्रशिक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणालियों और परिवहन नेटवर्क में निवेश करता है।
जैसे-जैसे उत्पादकता बढ़ती है, मजदूरी भी बढ़ सकती है। श्रमिक को अधिक
आय स्थिरता प्राप्त होती है, जबकि कंपनी कर अदा करती है और व्यापक
आपूर्ति श्रृंखलाओं को समर्थन देती है।
अंतर केवल व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं है। विनिर्माण क्षेत्र का
श्रमिक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा होता है जो निरंतर आर्थिक मूल्य, नवाचार
और निर्यात प्रतिस्पर्धा का सृजन करती है। दूसरी ओर, दुकानदार
मुख्यतः एक सीमित स्थानीय बाजार के भीतर ही जीवित रहने का प्रयास करता है।
जब लाखों श्रमिक पहली श्रेणी में केंद्रित होते हैं, तब
राष्ट्रीय उत्पादकता वृद्धि सीमित रहती है। जब लाखों श्रमिक दूसरी श्रेणी में
स्थानांतरित होते हैं, तब अर्थव्यवस्थाएँ संरचनात्मक रूपांतरण का अनुभव करती हैं।
अनौपचारिक एवं औपचारिक विकास का मार्ग
### सीमाएँ और प्रतिवाद
फिर भी, कल्याणकारी व्यवस्थाओं को पूर्णतः अस्वीकार करना उचित नहीं होगा।
कल्याणकारी कार्यक्रम कमजोर वर्गों की सुरक्षा, आर्थिक मंदी के
समय उपभोग को बनाए रखने तथा सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते हैं।
वास्तविक समस्या स्वयं कल्याण नहीं है, बल्कि
संरचनात्मक रूपांतरण का अभाव है। कल्याण को औपचारिकीकरण की दिशा में एक सेतु के
रूप में कार्य करना चाहिए, न कि उत्पादक रोजगार के विकल्प के रूप
में।
इसी प्रकार, अनौपचारिक उद्यमों को केवल आर्थिक बाधा
के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अनेक सफल कंपनियाँ छोटे व्यवसायों के रूप में ही
प्रारंभ हुई थीं। चुनौती यह है कि उन्हें वित्त, आधारभूत संरचना,
प्रौद्योगिकी,
विधिक
संरक्षण और बाजारों तक ऐसी पहुँच उपलब्ध कराई जाए जिससे वे विकसित हो सकें।
अतः एक संतुलित विकास रणनीति सामाजिक सुरक्षा को औद्योगिक विस्तार,
विनिर्माण
वृद्धि, उद्यम विस्तार और कार्यबल कौशल विकास की आक्रामक नीतियों के साथ
जोड़ती है।
उपलब्ध साक्ष्य प्रबल रूप से संकेत करते हैं कि दीर्घकालिक समृद्धि
उत्पन्न करने के लिए एक औपचारिक, रोजगार-सृजनकारी आर्थिक प्रतिरूप
कल्याण-निर्भर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक श्रेष्ठ है। यद्यपि
कल्याणकारी व्यवस्थाएँ और अनौपचारिक स्व-रोजगार व्यापक निर्धनता तथा सामाजिक विघटन
को रोकने में प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं, किंतु वे अपने आप में उन उत्पादकता
लाभों का निर्माण नहीं करते जो स्थायी संपत्ति सृजन के लिए आवश्यक हैं।अनौपचारिकता
अक्सर अल्प-रोजगार, निम्न आय तथा सीमित उन्नति अवसरों को छिपा देती है, जिसके
कारण लाखों लोग निरंतर श्रम भागीदारी के बावजूद श्रमशील निर्धन बने रहते हैं।
इतिहास दर्शाता है कि राष्ट्र तब स्थायी समृद्धि प्राप्त करते हैं जब श्रमिक
निम्न-उत्पादकता वाली अनौपचारिक गतिविधियों से उच्च-उत्पादकता वाले औपचारिक
रोजगारों में स्थानांतरित होते हैं।औद्योगीकरण, विनिर्माण
वृद्धि, उद्यम विस्तार और प्रौद्योगिकीय प्रगति आय का विस्तार करते हैं,
कराधार
को मजबूत बनाते हैं तथा निवेश और नवाचार के स्व-प्रेरित चक्रों का निर्माण करते
हैं। जब तक छोटे अनौपचारिक उद्यम बड़े, प्रतिस्पर्धी और औपचारिक व्यवसायों में
परिवर्तित नहीं होते, तब तक आर्थिक विकास संरचनात्मक रूप से सीमित बना रहता है।अतः,
यद्यपि
कल्याणकारी व्यवस्थाएँ एक आवश्यक सुरक्षा कवच हैं, व्यापक और
स्थायी समृद्धि का दीर्घकालिक मार्ग ऐसी गतिशील औपचारिक अर्थव्यवस्था के निर्माण
में निहित है जो बड़े पैमाने पर उत्पादक रोजगार उत्पन्न करने में सक्षम हो।
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