भारत का आर्थिक रूपांतरण विकासशील विश्व के सबसे जटिल श्रम-बाज़ार विरोधाभासों में से एक प्रस्तुत करता है। देश प्रतिवर्ष लाखों स्नातक, डिप्लोमा धारक और विद्यालय छोड़ने वाले युवाओं को तैयार करता है, फिर भी नियोक्ता लगातार कार्य-तत्पर श्रमिकों की कमी की शिकायत करते हैं। साथ ही, तीव्र आर्थिक वृद्धि और तकनीकी प्रगति के बावजूद, कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा अब भी कृषि, निर्माण और अन्य निम्न-उत्पादकता वाले क्षेत्रों में केंद्रित है। यह स्पष्ट विरोधाभास शिक्षा व्यवस्था और श्रम-बाज़ार की आवश्यकताओं के बीच गहरे संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाता है। भारत की मूलभूत कौशल समस्या शिक्षा से निकलने वाले मानव संसाधन और उद्योग की मांग के बीच गंभीर असंगति से उत्पन्न होती है, जो समकालीन विकास की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता को अभिव्यक्त करती है। जैसे-जैसे तकनीकी प्रगति विशेषीकृत कौशलों को अधिक महत्व देती जा रही है, अर्थव्यवस्था उन श्रमिकों को समाहित करने में संघर्ष कर रही है जिनके पास आधुनिक उद्योग के लिए आवश्यक दक्षताएँ नहीं हैं। परिणामस्वरूप, कृषि और निर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र रोजगार के प्रमुख आश्रयस्थल बने हुए हैं। यद्यपि यह व्यवस्था व्यापक बेरोज़गारी और सामाजिक अस्थिरता को रोकती है, किंतु यह निम्न उत्पादकता, वेतन ठहराव और व्यापक अल्परोज़गारी को भी स्थायी बनाती है। इस चुनौती को समझने के लिए शिक्षा, तकनीकी परिवर्तन, श्रम अवशोषण और सार्वजनिक निवेश के बीच संबंधों का अध्ययन आवश्यक है।
कौशल-पक्षपाती तकनीकी प्रगति की अवधारणा भारत की श्रम-बाज़ार संबंधी
चुनौतियों के विश्लेषण हेतु एक उपयोगी ढाँचा प्रदान करती है। इस सिद्धांत के
अनुसार तकनीकी उन्नति उन श्रमिकों की मांग बढ़ाती है जिनके पास उन्नत संज्ञानात्मक,
तकनीकी
और डिजिटल कौशल होते हैं, जबकि नियमित और कम-कौशल वाले श्रम की
मांग को घटाती है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएँ आधुनिक होती हैं, उद्यम
ऐसे श्रमिकों की तलाश करते हैं जो जटिल मशीनरी संचालित कर सकें, डिजिटल
प्रणालियों का प्रबंधन कर सकें, आँकड़ों का विश्लेषण कर सकें और बदलती
उत्पादन प्रक्रियाओं के अनुरूप स्वयं को ढाल सकें। जब शैक्षिक संस्थान इन दक्षताओं
की आपूर्ति करने में विफल रहते हैं, तब कौशल-अंतराल उत्पन्न होता है।
नियोक्ताओं को योग्य श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ता है, जबकि
बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में रहते हैं। यह स्थिति ऐसा विरोधाभास
उत्पन्न करती है जिसमें बेरोज़गारी और श्रमिकों की कमी एक साथ विद्यमान रहती हैं।
मानव पूँजी सिद्धांत भी यह संकेत देता है कि शिक्षा श्रमिकों की उत्पादकता और आय
में वृद्धि करती है। किंतु इसका लाभ केवल शिक्षा के वर्षों पर नहीं, बल्कि
अर्जित कौशलों की प्रासंगिकता और गुणवत्ता पर निर्भर करता है। यदि शिक्षा केवल
प्रमाणपत्र प्रदान करे और रोजगार योग्य दक्षताएँ न दे, तो शैक्षिक
उपलब्धियों में वृद्धि के बावजूद श्रम-बाज़ार परिणाम कमजोर बने रहते हैं।
संरचनात्मक रूपांतरण सिद्धांत भी महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। ऐतिहासिक
रूप से सफल विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने श्रमिकों को निम्न-उत्पादकता कृषि से
विनिर्माण और आधुनिक सेवाओं की ओर स्थानांतरित किया। इस परिवर्तन ने उत्पादकता,
वेतन
और आर्थिक वृद्धि को बढ़ाया। जब यह संक्रमण धीमी गति से होता है, तब
अतिरिक्त श्रम कम आय और सीमित उन्नयन अवसरों वाले अनौपचारिक क्षेत्रों में फँसा
रहता है।
भारत ने पिछले दशकों में शिक्षा तक पहुँच के विस्तार में उल्लेखनीय
सफलता प्राप्त की है। विद्यालयी नामांकन दरों में पर्याप्त सुधार हुआ है, उच्च
शिक्षा संस्थानों की संख्या बढ़ी है और लाखों युवा अब औपचारिक योग्यताएँ प्राप्त
कर रहे हैं। फिर भी शैक्षिक मात्रा हमेशा रोजगार योग्यता में परिवर्तित नहीं हुई
है। अनेक स्नातकों के पास वे व्यावहारिक दक्षताएँ नहीं हैं जिनकी नियोक्ताओं को
आवश्यकता होती है। अभियंत्रण स्नातकों के पास सैद्धांतिक ज्ञान तो हो सकता है,
किंतु
औद्योगिक अनुभव सीमित होता है। सामान्य उपाधि धारकों को अकादमिक ज्ञान को
कार्यस्थल की आवश्यकताओं में लागू करने में कठिनाई होती है। कार्योन्मुख शिक्षा
व्यवस्था कार्यबल के आकार की तुलना में अब भी अपर्याप्त है। यह असंतुलन तीव्र
तकनीकी परिवर्तन के कारण और अधिक बढ़ जाता है। स्वचालन, कृत्रिम
बुद्धिमत्ता, डिजिटलीकरण और उन्नत विनिर्माण लगातार कौशल आवश्यकताओं को बदल रहे
हैं। शैक्षिक संस्थान प्रायः उद्योग की तुलना में अधिक धीमी गति से अनुकूलित होते
हैं, जिससे प्रशिक्षण और रोजगार अवसरों के बीच स्थायी अंतर बना रहता है।
परिणामस्वरूप अनेक श्रमिक उच्च-उत्पादकता क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर पाते। इसके
बजाय वे कृषि, निर्माण, खुदरा व्यापार, परिवहन और अन्य श्रम-प्रधान गतिविधियों
में रोजगार प्राप्त करते हैं, जहाँ औपचारिक कौशल की आवश्यकता सीमित
होती है।
यद्यपि कृषि और निर्माण की अक्सर आलोचना की जाती है, फिर
भी वे भारत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक कार्य करते हैं। ये क्षेत्र उन लाखों
श्रमिकों को समाहित करते हैं जो अन्यथा बेरोज़गार रह सकते थे। कृषि अब भी
राष्ट्रीय उत्पादन में अपने योगदान की तुलना में अनुपातहीन रूप से अधिक श्रमिकों
को रोजगार देती है। इसी प्रकार निर्माण क्षेत्र प्रवासी और कम-कौशल वाले श्रमिकों
के लिए प्रमुख रोजगार स्रोत है। ये क्षेत्र उत्पादकता कम होने के बावजूद आजीविका
उपलब्ध कराते हैं। यदि ऐसे अवशोषक क्षेत्र न हों, तो भारत को
गंभीर बेरोज़गारी दबावों का सामना करना पड़ सकता है। श्रमबल में प्रतिवर्ष होने
वाली विशाल वृद्धि को देखते हुए अर्थव्यवस्था को तत्काल रोजगार उपलब्ध कराने वाले
तंत्रों की आवश्यकता होती है। इस दृष्टि से निम्न-उत्पादकता क्षेत्र सामाजिक और
आर्थिक आघात-शामक के रूप में कार्य करते हैं। किंतु इन क्षेत्रों पर निर्भरता की
बड़ी लागत भी है। उत्पादकता निम्न बनी रहती है क्योंकि अत्यधिक श्रमिक सीमित पूँजी
और प्रौद्योगिकी को साझा करते हैं। आय सीमित रहती है, रोजगार प्रायः
अनौपचारिक होता है और कौशल अर्जन के अवसर कम होते हैं। परिणामस्वरूप श्रमिक
असुरक्षा और अल्परोज़गारी के चक्र में फँसे रहते हैं।
निम्न-उत्पादकता क्षेत्रों में श्रम की निरंतर उपस्थिति राष्ट्रीय
उत्पादकता वृद्धि को सीधे प्रभावित करती है। जब श्रम का बड़ा भाग सीमित मूल्यवर्धन
वाली गतिविधियों में लगा रहता है, तब प्रति श्रमिक उत्पादन अपनी संभावित
क्षमता से काफी नीचे बना रहता है। जब बड़ी संख्या में श्रमिक निम्न-उत्पादकता
रोजगार में बने रहते हैं, तब राष्ट्रीय औसत उत्पादकता की वृद्धि
अपेक्षाकृत धीमी हो जाती है। यह स्थिति वेतनों को भी प्रभावित करती है।
श्रम-प्रचुर क्षेत्रों में श्रमिकों की सौदेबाज़ी शक्ति सीमित होती है। नियोक्ता
आसानी से श्रमिकों का प्रतिस्थापन कर सकते हैं, जिससे वेतन
वृद्धि पर दबाव कम हो जाता है। अनौपचारिक रोजगार व्यवस्थाएँ श्रमिक संरक्षण और आय
सुरक्षा को और कमजोर करती हैं। परिणामस्वरूप आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ जनसंख्या के
बड़े हिस्से के लिए वेतन स्थिर बने रह सकते हैं। राष्ट्रीय आय बढ़ती है, किंतु
उसके लाभ असमान रूप से वितरित होते हैं क्योंकि उत्पादकता लाभ पूँजी-प्रधान और
कौशल-प्रधान क्षेत्रों में केंद्रित रहते हैं।
इन चुनौतियों को पहचानते हुए भारत ने रोजगार योग्यता बढ़ाने और
शिक्षा तथा उद्योग के बीच की खाई को पाटने के उद्देश्य से अनेक कौशल-विकास
कार्यक्रम प्रारंभ किए हैं। इन पहलों का उद्देश्य व्यावसायिक प्रशिक्षण, शिक्षुता
अवसर, प्रमाणन कार्यक्रम और उद्योग-संबद्ध दक्षताओं का विकास करना है। ये
इस तथ्य की महत्वपूर्ण स्वीकृति हैं कि केवल पारंपरिक शैक्षिक विस्तार श्रम-बाज़ार
की चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता। किंतु कौशल-विकास प्रयास अक्सर संरचनात्मक
बाधाओं का सामना करते हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम बहुत छोटे हो सकते हैं, नियोक्ताओं
से पर्याप्त रूप से जुड़े नहीं होते, या अत्यंत सीमित दक्षताओं पर केंद्रित
रहते हैं। अनेक प्रतिभागियों को प्रशिक्षण पूरा करने के बाद भी स्थायी रोजगार
प्राप्त करने में कठिनाई होती है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कौशल
कार्यक्रम बुनियादी शिक्षा की कमजोरियों की पूरी भरपाई नहीं कर सकते। यदि
विद्यार्थी विद्यालय से ही साक्षरता, गणनात्मक क्षमता, संप्रेषण
कौशल और समस्या-समाधान दक्षताओं के बिना निकलते हैं, तो उन्नत
व्यावसायिक प्रशिक्षण कम प्रभावी सिद्ध होता है।
पूर्वी एशिया की अनेक अर्थव्यवस्थाओं ने अपने विकास के दौरान इसी
प्रकार की चुनौतियों का सामना किया था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा, तकनीकी
प्रशिक्षण, व्यावसायिक संस्थानों और उद्योग तथा शिक्षा व्यवस्था के बीच घनिष्ठ
समन्वय में व्यापक निवेश किया। विनिर्माण विस्तार ने कृषि से बाहर आने वाले
श्रमिकों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार अवसर उपलब्ध कराए। जैसे-जैसे उत्पादकता
बढ़ी, वेतनों में वृद्धि हुई और श्रम धीरे-धीरे उच्च-मूल्य आर्थिक
गतिविधियों की ओर स्थानांतरित हुआ। ये अनुभव दर्शाते हैं कि श्रम-बाज़ार के सफल
रूपांतरण के लिए शिक्षा की गुणवत्ता, औद्योगिक वृद्धि, आधारभूत
संरचना विकास और कार्यबल प्रशिक्षण में एक साथ प्रगति आवश्यक है। केवल कौशल-विकास
पर्याप्त नहीं है, जब तक कुशल श्रम की समतुल्य मांग उत्पन्न न हो।
यह कथन भारत के आर्थिक विकास के समक्ष उपस्थित एक केंद्रीय चुनौती को
सटीक रूप से अभिव्यक्त करता है। देश की कौशल समस्या केवल प्रशिक्षण कार्यक्रमों की
कमी नहीं है, बल्कि शैक्षिक परिणामों और श्रम-बाज़ार की आवश्यकताओं के बीच एक गहरा
संरचनात्मक असंतुलन है। तीव्र तकनीकी परिवर्तन लगातार रोजगार योग्य कौशलों की मांग
बढ़ा रहा है, जबकि शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणालियाँ उसके साथ कदम मिलाने
में संघर्ष कर रही हैं। परिणामस्वरूप लाखों श्रमिक कृषि, निर्माण और अन्य
निम्न-उत्पादकता क्षेत्रों में केंद्रित बने हुए हैं। यद्यपि ये क्षेत्र अतिरिक्त
श्रम को समाहित करने और व्यापक बेरोज़गारी को रोकने के लिए अनिवार्य तंत्र प्रदान
करते हैं, फिर भी वे निम्न उत्पादकता, अनौपचारिक रोजगार, वेतन
ठहराव और अल्परोज़गारी को स्थायी बनाते हैं। कौशल-विकास पहलें एक महत्वपूर्ण उत्तर
प्रस्तुत करती हैं, किंतु उनकी प्रभावशीलता बुनियादी शिक्षा की कमजोरियों और उद्योग की
आवश्यकताओं के साथ अपर्याप्त सामंजस्य के कारण सीमित रहती है। स्थायी सुधार के लिए
आवश्यक है कि शैक्षिक निवेश को प्रत्यक्ष रूप से श्रम-बाज़ार की वास्तविकताओं से
जोड़ा जाए, बुनियादी अधिगम परिणामों को सुदृढ़ किया जाए, व्यावसायिक
मार्गों का विस्तार किया जाए और विनिर्माण तथा आधुनिक सेवाओं में अधिक उत्पादक
रोजगार अवसरों का सृजन किया जाए। अंततः भारत की विकास चुनौती केवल अधिक लोगों को
शिक्षित करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि शिक्षा रोजगार योग्य कौशलों,
उत्पादक
कार्य और बढ़ती आय में परिवर्तित हो। केवल शिक्षा, प्रशिक्षण और
आर्थिक संरचना के बीच समुचित सामंजस्य स्थापित करके ही देश अपनी जनसांख्यिकीय
क्षमता को दीर्घकालिक समृद्धि में रूपांतरित कर सकता है।
No comments:
Post a Comment