परिचय
भारत में खाद्य मूल्यों की मुद्रास्फीति (फूड इन्फ्लेशन) एक लगातार
और जटिल समस्या रही है। 2014 से मोदी सरकार के सत्ता में आने के
बाद से, उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) के आधार पर
खाद्य मुद्रास्फीति औसतन 5-5.7% सालाना रही है, जो कुल CPI
मुद्रास्फीति
के बराबर या उससे अधिक है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, 2012 से
2026 तक खाद्य मुद्रास्फीति का औसत 5.7% रहा। 2014 से
2025 तक के 11 वर्षों में संचयी (कम्पाउंड) खाद्य मूल्य वृद्धि लगभग 75-85%
रही है—यदि औसत 5.5% वार्षिक दर मानें तो (1.055)^11 ≈ 1.80, अर्थात 80%
वृद्धि। पुराने आधार (2012=100) पर CFPI दिसंबर 2025
में ~201 अंक तक पहुँचा, जबकि 2014 में यह ~120-130 के
आसपास था।
यह समस्या मौसमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। सरकार ने न्यूनतम
समर्थन मूल्य (MSP), निर्यात प्रतिबंध, बफर स्टॉक रिलीज, सब्सिडी
और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत स्टॉक सीमा जैसे उपाय किए, फिर भी कीमतें
नियंत्रित नहीं हो सकीं। यह निबंध चर्चा करता है कि सरकार क्यों असफल रही, इससे
खाद्य बाजार प्रबंधन के बारे में क्या पता चलता है, गरीबों की खाद्य
उपभोग प्रवृत्ति (MPC), वास्तविक मजदूरी पर प्रभाव, और क्या ये तथ्य 2023-24
हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे (HCES) पर आधारित नई CPI
सीरीज
(आधार वर्ष 2024=100, फरवरी 2026 में जारी) में खाद्य भार 45.86% से घटाकर 36.75%
करने का समर्थन करते हैं। MOSPI डेटा, आर्थिक
सर्वेक्षण और HCES 2023-24 (ग्रामीण खाद्य हिस्सा 47.04%, शहरी
39.68%) के आँकड़ों से स्पष्ट है कि सुधार आवश्यक हैं।
सरकार खाद्य मूल्यों को नियंत्रित क्यों नहीं कर पाती?
भारत की कृषि 50% से अधिक वर्षा-आधारित है, जिससे
जलवायु झटके (गर्मी की लहरें, अनियमित बारिश) कीमतों को अस्थिर करते
हैं। ICAR अध्ययनों के अनुसार, 30°C से ऊपर हर 1°C वृद्धि गेहूँ की
पैदावार 3-4% घटाती है। SBI रिसर्च (2024) में बिहार (-0.44)
और
महाराष्ट्र (-0.36) जैसे राज्यों में नकारात्मक सहसंबंध पाया गया। फसल के बाद 20-30%
नुकसान (कोल्ड स्टोरेज क्षमता मात्र 10% आवश्यक) और खराब लॉजिस्टिक्स समस्या
बढ़ाते हैं।
मांग पक्ष पर, आय वृद्धि से प्रोटीन युक्त खाद्य
(सब्जी, दूध, मांस) की माँग बढ़ी, जिनकी कीमतें 2012-2024
में सबसे तेज़ चढ़ीं। MSP बढ़ोतरी किसानों को लाभ पहुँचाती है,
लेकिन
उत्पादकता वृद्धि के अभाव में लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति पैदा करती है।
गुलाटी-सैनी अध्ययन MSP को अनाज और दालों में मुद्रास्फीति से जोड़ते हैं।
सरकारी प्रतिक्रियाएँ प्रतिक्रियात्मक हैं—निर्यात प्रतिबंध (चावल,
प्याज),
स्टॉक
लिमिट—जो बाजार को विकृत करते और होर्डिंग को बढ़ावा देते हैं। खाद्य सब्सिडी बिल ~₹2
लाख करोड़ सालाना, लेकिन PDS में 30-40% लीकेज। RBI का 4% ±2% लक्ष्य
सप्लाई-साइड खाद्य मुद्रास्फीति (CPI का 40-50%) पर कम प्रभावी।
चुनावी राजनीति किसान हितों को प्राथमिकता देती है। परिणाम: 2023-24
में सब्जियों में 16-20% YoY उछाल, कुल CPI
4-5%
रहने पर भी। 2025 में कुछ महीनों में डिफ्लेशन (-5% अक्टूबर) देखा
गया, लेकिन लंबे समय में अस्थिरता बनी रही।
खाद्य बाजार प्रबंधन के बारे में क्या कहता है?
निरंतर असफलता खाद्य बाजार की गहरी खामियों को दर्शाती है। APMC
कानूनों
के तहत विखंडित विपणन, 30-40% बिचौलिए मार्जिन, कम
बाजार एकीकरण और कमजोर मूल्य संचरण। फार्म-टू-रिटेल गैप बड़ा। FDI उदारीकरण
के बावजूद निजी निवेश कम, छोटे जोत (<1 हेक्टेयर) और
नीति अनिश्चितता कारण। MSP पूर्वाग्रह से चावल-गेहूँ पर निर्भरता,
उच्च
मूल्य फसलों में विविधीकरण कम। सिंचाई मात्र 48% क्षेत्र को कवर
करती है।
FCI स्टॉक बफर से अधिक होने पर निजी क्षेत्र को भीड़-भाड़। जलवायु
अनुकूलन अपर्याप्त। 2014 से 70-85% संचयी वृद्धि (गैर-खाद्य CPI से अधिक) शासन
की कमी दिखाती है—प्रतिक्रियात्मक नियंत्रण अनिश्चितता पैदा करते, संरचनात्मक
सुधार (उपज वृद्धि, मूल्य भविष्यवाणी) धीमे। प्रभावी प्रबंधन के लिए एकीकृत मूल्य
श्रृंखला, फ्यूचर्स बाजार विस्तार और डेटा-आधारित नीतियाँ जरूरी, जिनमें
प्रगति सीमित रही।
संचयी मुद्रास्फीति, गरीबों की खाद्य उपभोग प्रवृत्ति और
वास्तविक मजदूरी
2014 से ~75-85% संचयी खाद्य मूल्य वृद्धि गरीबों
(निचले 40-50%, ~50-60 करोड़) पर भारी पड़ी, जिनका 50-60%+ व्यय खाद्य पर
(ग्रामीण निचले quintile में और अधिक)। HCES 2023-24: ग्रामीण
कुल खाद्य हिस्सा 47.04% (2011-12 के 52.9% से कम),
शहरी
39.68% (42.62% से कम), लेकिन गरीबों में 55-65%। एंगेल का नियम—आय बढ़ने पर खाद्य
हिस्सा घटता—गरीबों पर लागू नहीं; उनकी खाद्य MPC 0.6-0.7
बनी रही।
उच्च मुद्रास्फीति से पुनर्विनियोजन: गैर-खाद्य कटौती या पोषण
गुणवत्ता गिरावट, कुपोषण बढ़ा (NFHS: स्टंटिंग ~35%)। CMIE और
द्रेज़े विश्लेषण: 2014-2024 में ग्रामीण वास्तविक मजदूरी स्थिर या
नकारात्मक—कृषि/निर्माण नाममात्र दैनिक मजदूरी ~60-80% बढ़ी, लेकिन
खाद्य मुद्रास्फीति ने लाभ खा लिया। MGNREGA मजदूरी CFPI
से
पिछड़ी। 10% मजदूरी वृद्धि से 2.3% खाद्य मुद्रास्फीति जुड़ी। गरीबों के
लिए यह कैलोरी intake घटाती, सस्ते स्टेपल्स की ओर धकेलती, मानव पूंजी को
नुकसान पहुँचाती। 6%+ GDP वृद्धि के बावजूद असमानता बढ़ी।
नई CPI (आधार 2024) में खाद्य भार कम करने का समर्थन?
हाँ, पूरी तरह। नई CPI सीरीज (आधार 2024=100, HCES
2023-24 पर आधारित, जनवरी 2026 से लागू) में
खाद्य एवं पेय पदार्थों का भार 45.86% (2012 सीरीज) से घटकर
36.75% (या पुरानी वर्गीकरण में ~40.1%) हो गया। यह
एंगेल के नियम का प्रतिबिंब—आय वृद्धि से विविधीकरण (आवास, परिवहन, स्वास्थ्य,
सेवाएँ
बढ़े; विविध 33.15%)। सब्जी/मांस उछाल अब हेडलाइन को कम
प्रभावित करते, अस्थिरता कम (ग्रामीण CPI में खाद्य 70%+ स्विंग)।
जनवरी 2026 में नई सीरीज में हेडलाइन 2.75%, खाद्य 2.13%।
पुराने भार सप्लाई-साइड झटकों को अतिरंजित करते, RBI टारगेटिंग जटिल
बनाते। नया भार वर्तमान बास्केट का अधिक प्रतिनिधि, मौसमी विकृति कम,
मौद्रिक
नीति बेहतर। आलोचक कहते हैं यह गरीबों का दर्द छुपाता, लेकिन CPI
औसत
उपभोग मापता है (गरीबी रेखा अलग)। HCES डेटा (खाद्य हिस्सा घटा) और संचयी उच्च
खाद्य मुद्रास्फीति सुधार का समर्थन करते—नीति अस्थायी झटकों से बचती, जबकि
DBT, पोषण योजनाएँ गरीबों के लिए अलग।
निष्कर्ष
2014 से खाद्य मूल्यों पर सरकार का नियंत्रण नाकाम रहना संरचनात्मक कमजोरियों (जलवायु, सप्लाई चेन, MSP पूर्वाग्रह, APMC) का परिणाम है, जो खाद्य बाजार प्रबंधन की विफलता दर्शाता है—विखंडित, कम निवेशपूर्ण, प्रतिक्रियात्मक। ~75-85% संचयी वृद्धि गरीबों की उच्च MPC (47% ग्रामीण HCES) और स्थिर वास्तविक मजदूरी (0-1% वार्षिक) से उनके उपभोग और कल्याण को चोट पहुँचाती है। ये निष्कर्ष नई CPI (आधार 2024) में खाद्य भार 36.75% करने का मजबूत समर्थन करते, जो आधुनिक उपभोग पैटर्न को प्रतिबिंबित करता और नीति को प्रभावी बनाता है। लेकिन दीर्घकालिक समाधान—उत्पादकता बढ़ाना, मूल्य श्रृंखला सुधार, जलवायु अनुकूलन—जरूरी, अन्यथा गरीबों की पीड़ा बनी रहेगी। सुधार के साथ लक्षित हस्तक्षेप से ही समावेशी विकास संभव।